शुक्रवार को नहाए-खाए के साथ लोक आस्था का महापर्व शुरू हो गया। बुधवार को गोवर्धन पर्व, गुरुवार को चित्रगुप्त भगवान की पूजा-अर्चना के बाद छठ महापर्व की तैयारी शुरू हो गई है। छठ पर्व को लेकर जिले के सभी बाजार सजने लगे हैं, व लोगों ने खरीदारी शुरू कर दी है। गुरुवार और शुक्रवार को बाज़ार में छठ पर्व को लेकर आम दिनों की तुलना में खूब चहल-पहल देखा गया। छठ व्रत की सामग्री आदि की ख़रीदारी करने के लिए बाज़ार में आस्था की भीड़ उमड़ने लगी है। इस दौरान मुख्य सड़क भी वाहनों व लोगों की भीड़ से काफी व्यस्त रहा। दीपावली पर्व संपन्न होने के साथ लोग महापर्व छठ पूजा की तैयारी में जुट जाते हैं।सामान्य दिनों में औसतन 30 से ₹40 बिकने वाली नारियल, 80 से ₹100 जोरे बिकने वाली सूप, 200 से ढाई ₹250 बिकने वाली डाला, 70 से ₹80 बिकने वाली ढकिया व अन्य सामग्रियों की क़ीमत आजकल आसमान छू रहा है। छठ व्रत के दौरान करे नियम, निष्ठा, संयम, सात्विक प्रवृत्ति, सहिष्णुता, सह अस्तित्व के सहारे पूजा-अर्चना का विधान है। न कोई धर्म ग्रंथ, न कोई मंत्र, बस हर एक की श्रद्धा और हर एक के एक अराध्य।छठ व्रतियों के मान्यताओं के मुताबिक उर्जा, प्रकाश, शक्ति और चेतना के असीम स्रोत भगवान सूर्य चर और अचर जगत में गति, प्रगति और विकास के वाहक हैं। लोक आस्था के महापर्व छठ में सूर्योपासना के जरिए लोग सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।चार दिवसीय छठ महापर्व आज से शुरू हो गया है। 28 अक्टूबर शुक्रवार को नहाए खाए है।नहाए-खाए का अर्थ है, स्नान कर भोजन करना। शरीर को शुद्ध कर सूर्योपासना के लिए तैयारी किया जाता है। व्रती नदी या तालाब में स्नान कर कच्चे चावल का भात, चना दाल और कद्दू (लौकी या घीया) प्रसाद के रूप में बनाकर ग्रहण करती है।दूसरे दिन 29 अक्टूबर शनिवार को खरना या लोहंडा है।36 घंटे के लिए निर्जला अनुष्ठान के संकल्प का दिन। इसमें व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास कर सांयकाल में पूजा कर प्रसाद ग्रहण करेगी। मिट्टी के चूल्हे पर गाय के दूध व गुड़ से निर्मित खीर, ऋतुफल का प्रसाद व्रती द्वारा खुद बनाने की परंपरा है।तीसरे दिन 30 अक्टूबर रविवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य।केवल छठ में ही डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का प्रावधान है। ऐसी मान्यता है कि सांयकाल में सूर्य देव और उनकी पत्नी देवी प्रत्यूषा की भी उपासना की जाती है। जल में खड़े होकर सूप में फल, ठेकुआ आदि रखकर अर्घ्य देने की परंपरा है।चौथे दिन 31 अक्टूबर सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य माना जाता है कि जल में कमर तक खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा महाभारत काल से शुरू हुई। सप्तमी तिथि को व्रती जल में कमर तक खड़े होकर सूर्य को जल अर्पित करते हैं।
