कटिहार बिहार का उत्तरी पूर्वी सीमांत जिला है। यह जिला भौगोलिक रूप से एक मात्र जिला है जो उत्तर पूर्व से दक्षिण पूर्व तक पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा हुआ है। इसकी दक्षिणी सीमा झारखंड से और दक्षिण पश्चिम सीमा बिहार के भागलपुर जिला से मिलती है। पूरब में महानन्दा नदी, पश्चिम में कोशी एवं दक्षिण पश्चिम में गंगा नदी बहती है। उत्तर पूर्वी भारत के असम तथा अन्य राज्य के लिए रेल मार्ग का प्रवेश द्वार है। इसकी सामरिक दृष्टि से भी खासी अहमियत है। एन-एफ रेलवे का मंडल कार्यालय भी है। मुजफ्फरपुर के बाद कपड़ा व्यवसाय के लिए सीमांचल तथा कोशी का मुख्य थोक बाजार है। ऐलोपैथ दवाओं के कारोबार के लिए यदि पूर्णियाँ को बड़ा बाजार माना जाता है। तो होमियों पैथिक दवाओं के लिए कटिहार, बंगाल के बड़े हिस्से से लेकर नेपाल तक के लिए आपूर्ति का केन्द्र है।
पश्चिम बंगाल का सीमावर्ती राज्य होने की वजह से इस जिला की बड़ी आबादी पर बंगाली बोलचाल, रहन सहन, पहनावा, सभ्यता संस्कार, खान पान यहाँ तक कि शादी विवाह के कई रीति रिवाज का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। बल्कि बंगाल से तो रोटी बेटी का संबंध है।
सीमांचल के अन्य जिलों की तरह कटिहार भी प्रतिवर्ष नियमित रूप से आने वाली प्रलयकारी व विनाशकारी बाढ़ की विभिषिका से ग्रस्त होता रहता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के सात (7) दशक के बाद भी इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका। कृषि ही आय तथा रोजगार का मुख्य स्रोत है। बाढ़ से न केवल फसलें तबाह होती है बल्कि हजारों एकड़ खेती की जमीन नदियों में समा जाती है। दूसरी तरफ कटाव से अनावश्यक बालू उपजाऊ जमीन पर जमा होकर वर्षो तक पैदावार से वंचित हो जाती है। बहुत बड़ी आबादी को अस्थायी और स्थायी दोनों प्रकार से विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। अर्द्ध बेरोजगारी और पूर्ण बेरोजगारी से तंग आकर किसान तथा मजदूर बड़े पैमाने पर पलायन को मजबूर होते है। पलायन की समस्या से सबसे ज्यादा कोशी तथा सीमांचल जूझता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है।
कटिहार जिला के कई ऐतिहासिक तथा प्राचीन गाँव नदियों में समाहित होकर अपना वजूद खो चुके है। हजारों परिवार आज भी बाँधों तथा सड़कों के किनारें विस्थापित पड़े है।
मेरा तो छोटा सा अनुभव यह है कि प्रतिवर्ष बाढ़ आपदा से प्रभावित लोगों की सहायता एवं पुनर्वास के मद में खर्च की जाने वाली राशि के अतिरिक्त बाढ़ सुरक्षा की योजनाओं के नाम पर जो राशि, जिसका बड़ा हिस्सा, लूट, खसोट कर हजम कर दिया जाता है। उसे ही स्थायी समाधान के लिए योजनाबद्ध तरीके से ईमानदारी से लगाया जाता तो इस त्रासद स्थिति से उबारा जा सकता था।
प्राकृतिक रूप से भूमि और प्रचूर मात्रा में उपलब्ध जलसंसाधन का वैज्ञानिक प्रबंधन हो जाए तो कोशी और सीमांचल में विकास के नए आयाम जुड़ने लगेंगे। क्या राजनीतिज्ञों तथा लाल फीताशाही का नापाक गठजोड़ ऐसा होने देगा?
गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, उद्योग धन्धों का नदारद होना, खेती-किसानी में विचैलियों, व्यापारी गठजोड़ का शोषण आदि समस्याओं का भयंकर मकड़जाल हैं जिसको दलगत राजनीति की सुविधा के लिए कभी-कभी उछाला तो जाता है लेकिन पूर्व की भांति सबकुछ सामान्य हो जाता है।
कटिहार का धान (गरमा या अगहनी), मक्का, केला एवं मखाना उत्पादक जिला में शुमार होता है लेकिन दुर्भाग्य है कि तमाम दावों के बावजूद एक भी कृषि आधारित उद्योग की स्थापना नहीं हो सकी। ऐसी छिटफुट आद्योगिक इकाई का कभी शिलान्यास भी हुआ लेकिन अब वह शिलालेख भी अपना वजूद खो चुका है।
कटिहार में कभी दो जूट मिल्स (Mills), दिया सलाई और बिस्कूट की फैक्ट्रियाँ हुआ करती थी, लेकिन अब काल के गाल में समा गयी। कई लंबे संघर्षो तथा आन्दोलनों के बावजूद उसका पुनरूद्धार नहीं हो सका।
फलतः बहुत बड़ी संख्या में कामगार, कुशल-अकुशल, मजदूर बेरोजगार हो गए। अब तो पूर्व सांसद और जननेता युवराज भी नहीं रहे कि जान जोखिम में डालकर अपनी ही सरकार के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन कर सके या दलगत हित से ऊपर उठकर जनहित में जोरदार ढंग से अपनी मांग भी रख सके।
निष्पक्ष रूप से समीक्षा की जाए तो जन सरोकार के मुद्दों पर प्रभावी ढ़ंग से संघर्ष करने के लिए एक मात्र राजनेता बचे है डॅा0 राम प्रकाश महतो/वरन सुविधा की राजनीति का चलन ही आम है।
कटिहार राजनीति तथा सामाजिक रूप से शांत जिला रहा है। विगत कुछ वर्षो से इस शांति तथा सद्भाव को बिगाड़ने के कुछ अपवादों को छोड़ दे तो आमतौर पर सामाजिक सद्भाव और धार्मिक-साम्प्रदायिक, भाईचारा बनी रहती है। जहाँ तक मेरा स्मरण है चुनावी राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण से पाक कटिहार संसदीय क्षेत्र में भरतीय जनसंघ और मुस्लिम लीग में कूदने से इसकी शुरूआत हुई। इसके बाद लंबे समय तक इस फैक्टर से पाक राजनीति होती रही। आपातकाल के बाद पहली बार
1977 में लोकसभा चुनाव में काँग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर शाह तारिक अनवर की उम्मीदवारी के बाद लोक सभा चुनावों में उत्तरोत्तर धार्मिक घ्रुवीकरण बढ़ता चला गया।
नतीजा या हुआ कि वास्तविक समस्याएँ तथा जनसरोकार के मुद्दे राजनीतिक पटल से गायब होते गए।
इस जिला में कोढ़ा (अ0जा0), कदवा, कटिहार, बलरामपुर, बरारी, प्राणपुर एवं मनिहारी कुल सात (7) विधान सभा क्षेत्र है।
कोढ़ा विधान सभा क्षेत्र पहले से ही अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है।
नए परिसीमन में भी इसी कोटि में रखा गया हैं जबकि आबादी के अनुपात, जनसंख्या एवं सचर कमिटि की सिफारिशों के आलेाक में इस वि0स0 क्षेत्र को अनारक्षित हो जाना चाहिए था।
यही नहीं लगभग 42 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता वाले मनिहारी विधान सभा क्षेत्र को तकनीकी कारणों का हवाला देकर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। वर्ष 2010 के विधान सभा चुनाव से 67-मनिहारी (अ0ज0जा0) के बलरामपुर कर दिया गया।
बरारी विधान सभा क्षेत्र पहले खगड़िया लोकसभा क्षेत्र में था लेकिन नए परिसीमन में बरारी कटिहार संसदीय क्षेत्र मे और कोढ़ा (अ0जा0) को पूर्णियाँ लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बना दिया गया।
2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में कटिहार जिला में महागठबंधन का बोलबाला रहा। राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल युनाईटेड का गठबंधन स्वभाविक रूप से सामाजिक संरचना के अनुकूल था। इसका पूरा फायदा पूरे बिहार की तरह कटिहार में भी महागठबंधन को हुआ। कुल सात (7) में से 5 (पाँच) में महागठबंधन के प्रत्याशी अच्छे मतों के अंतर से विजय हुए।
कटिहार विधान सभा का परिणाम मामूली अंतर से भाजपा के तारकिशोंर प्रसाद के पक्ष में रहा। डॅा0 राम प्रकाश महतो (NCP) और जद (यू) के विजय सिंह निषाद (महापौर) के बीच धर्मनिरपेक्ष मतों के विभाजन की वजह से महागठबंधन की हार हो गयी। डॅा0 महतो तीसरे स्थान पर रहे।
इसी प्रकार प्राणपुर विधानसभा क्षेत्र का परिणाम भी भाजपा के पक्ष में गया। क्योंकि यह भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन नेता तारिक अनवर (अब कांग्रेस) की प्रत्याशी इशरत प्रवीण (पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष) और महागठबंधन के साझा उम्मीदवार तौकीर आलम (कांग्रेस) के बीच बराबरी का मुकाबला हो जाने से भाजपा के निवर्तमान विधायक विनोद कुमार सिंह (जो दिवंगत हो गए, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे) चुनाव जीत गए।
1999 में कांग्रेस से सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर अलग होकर
राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के संस्थापक श्री तारिक अनवर की अदूरदर्शी राजनीति निर्णयों की वजह से जिसे की सामाजिक न्याय, साम्प्रदायिक सदभाव, एवं धर्मनिरपेक्ष राजनीति को नुकसान होता रहा है। लोकसभा तथा विधान सभा के चुनाव में परिणाम इनके गवाह है।
अपनी मातृ पार्टी कांग्रेस में उनकी वापसी से यह रूकावट दूर हो गई है। लेकिन राजश रंजन उर्फ पप्पु यादव के नेतृत्व वाले प्रगतिशील गठबंधन जिसमे स्वयं उनकी अपनी जन अधिकार पार्टी, एसडीपीआई एवं चन्द्रशेखर रावण की पार्टी सक्रिय है। जबकि उपेन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व में सांसद असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM बिहार के चर्चित समाजवादी राजनेता देवेन्द्र प्रसाद यादव की पार्टी एवं स्वयं श्री कुशवाहा की लोकतांत्रिक समता पार्टी शामिल है के चुनावी मैदान में कूद जाने से चुनाव नतीजों पर पड़ने वाले प्रभावों विशेष रूप से महागठबंधन की संभावनाओं पर कितना प्रभाव पड़ेगा इसका तत्काल आकलन नहीं किया जा सकता है लेकिन बहुत से जागरूक मतदाता महागठबंधन की संभावनाओं को लेकर अभी से अपनी चिंता व्यक्त कर रहे है। हालांकि उपर्युकत दोनों गठबंधनों के जनाधार को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों बहुत गंभीर नहीं है। अलबत्ता यहाँ होने वाले तीसरे चरण के चुनाव में दोनों गठबंधनों के अतिरिक्त
राजग के घटक लोजपा की अब तक की घोषित रणनीति/निर्णय के मुताबिक जद (यू) के हिस्से की सीटों पर अपना उम्मीदवार मैदान में उतारने पर निश्चित रूप से चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते है। दूसरे शब्दों से महागठबंधन को चुनावी लाभ हो सकता है।
सात (7) विधान सभा क्षेत्रों में से 67-मनिहारी, बरारी और कदवा की सीटें जद (यू) के खाते में गयी है। याद दिला दें कि गत चुनाव में मनिहारी से राजग के लेाजपा प्रत्याशी अनिल उराँव ने अच्छी टक्कर दी थी।
अगर नीतीश को फिनीश करने की तथाकथित गोपनीय रणनीति पर वाकई भाजपा संजीदा है और सरजमीन पर उसके कोर मतदाताओं में यह संदेश चला गया तो बडा उलटफेर हो सकता है।
अभी तक दो चरणों के नामांकन का आकलन करें तो
जिस तरह संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेता लोजपा के टिकट पाने मे आपाधापी मचाए हुए हैं उससे तो पहली नजर मे भाजपा लोजपा की जरे जमीनी चालों को समझा जा सकता है।
लेकिन दसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि नीतीश कुमार में कोर वोटर अत्यंत पिछड़ा वर्ग और महादलित को गोलबंद रखने के लिए भी नीतीश के हार जाने का डर दिखाकर गोलबंद करने की सोची समझी चुनावी योजना तो नहीं है?
क्योंकि राष्ट्रपति के चुनाव मे राजग के उम्मदवार का समर्थन से नोटबंदी की प्रशंसा और तायीद से तीन तलाक बिल, जीएसटी या फिर किसान विरोधी तीनों कानूनों को पास करने में मदद हो जहाँ नीतीश कुमार से राज्य या विशेष रूप से मोदी जी को परेशानी हुई। इस बिन्दु को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
फिलहाल कोढ़ा (अ0जा0) का सुश्री पुनम पासवान/कांग्रेस, बरारी का नीरज कुमार (राजद), बलरामपुर का महबूब आलम (सी0पी0आई माले), कदवा का डॅा0 शकील अहमद खान (कांग्रेस), मनिहारी का मनोहर प्रसाद सिंह पूर्व आई0जी0 प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जबकि कटिहार और प्राणपुर से क्रमशः तारकिशोर प्रसाद और विनोद कुमार सिंह भाजपा विधायक हैं।
श्री सिंह का दिनांक- 12.10.2020 को दिल्ली के एक निजी अस्तपताल में देहांत हो चुका है। वह बिहार सरकार में केबिनेट मंत्री थे। कोरोना संक्रमण के शुरूआती दौर में ही कोविड-19 से संक्रमित हो गए थे ब्रेन हेम्ब्रेज भी हुआ था। जीवन के संघर्ष के युवावस्था में ही बाजी हार गए। अब पूर्व घोषणा के अनुसार उनकी पत्नी नीता सिंह राजग की प्रत्याशी होंगी। वैसे नामांकन के बाद ही कटिहार जिला का चुनावी परिदृष्य साफ होगा। सभी गुणा-गणित के हिसाब से चुनाव परिणामों की संभावनाओं का आकलन किया जा सकेगा। मौका मिला तो विधान सभा विश्लेषण से रूबरू करवाऊँगा। अभी तो बस इतना ही।
प्रो0 अब्दुल अहद
असिस्टेंट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग
आर0वाई0 मनिहारी कॅालेज, मनिहारी
कटिहार।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)
